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Summary
मैं नहीं मानता कि शांति का रास्ता आसान हो सकता है, लेकिन यह एक विकल्प है। गांधी के दौर में भी यह रास्ता नहीं था, लेकिन लोगों ने कोशिश की और सफल हुए।
“शांति का रास्ता कभी भी नहीं रहा, गांधी के दौर में भी नहीं रहा।”From the report
और बहुत सारी जगहों पर आप शांति के रास्ते के बात करते हैं कि पीस होना चाहिए कॉल्फिक के सिचुएशन में डायलोग की भूमिता होने चाहिए जिस तरह का जहर हम नागरिकों में देख रहे हैं आए दिन अहवार भरे हुए हैं कि सामने कोई कतलेयाम हो रहा है और माड़ने की बालातकार की दम्की थे ते इतने हिंसा के इतने जहरीले महाल में क्या शांति का रास्ता इतना आसान हो सकता है या कोई संगर्श का समाधान हो सकता है थी शांति का रास्ता कभी भी किसा नहीं रहा कभी भी नहीं गांधी के दौर में भी नहीं रहा, गांधी से पुर्प भी नहीं रहा, अगर मैं और पीछे जाओ तो गातम बुद्द के लिए भी रास्ता आसान नहीं था, लेकिन यह रास्ता था, लोगों ने कोशिश की, भी की पूर्णता सफल हुए मैं नहीं मानता लेकिन शांति के रास्ते पर पूर्ण सफलता ना भी मिले तो आप हुस्त तो नकसे में नहीं गरबड़ी थी, approval नहीं था, लेकिन वो university है. जब covid का समय था, तो उन्होंने जो जोहर university के campus में medical office है, क्योंकि जिला अस्पताल में इतनी जगा नहीं थी, तो आप मानिए उस building का इस्तमाल covid के जो patients थे, उनको रखने के लिए किया गया था. मैं वही कह रहा हूँ और अलग-अलग यह जोहर इन्वस्टी के अलावा अलग-अलग जगों के अगर मैं बात करूँ तो जो एक नजरिया है यह जो जहर फैला है ना समाज में हिंदू मुसल्मान इंसाइडर आउटसाइडर बाहरी भीतरी यह जहर खत्म नहीं होगा और यह पुण है उसमें यह जहर जा रहा है और वह जहर उसको मैं देख रहा हूं वह बच्चों की बातचीत में आ गया है कि वह गली मुहलों के सार्जनी की बहसों में आ गया है और यह हर समुदाई को प्रभावित कर रहा है