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Summary
पानी में घिरे हुए लोग प्रात्ना नहीं करते, वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को और एक दिन बिना किसी सूचना के खच्चर, बैल या भैंस की पीठ पर घरस बाब लाद कर चल देते हैं कहीं और.
“मैं हूँ प्रतियूश रॉनक देखते रहे हैं निउस पिंच शुक्रिया”From the report
पानी में घिरे हुए लोग प्रात्ना नहीं करते, वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को और एक दिन बिना किसी सूचना के खच्चर, बैल या भैंस की पीठ पर घरस बाब लाद कर चल देते हैं कहीं और. ये कितना अद्भूत है कि बाट चाहे जितनी भयानक हो उन्हें पानी में थोड़ी सी जगए जरूर मिल जाती, थोड़ा सा आस्मान। पानी में घिड़े हुए लोग अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध, भुने हुए चने, वे ले आते हैं चिलम और आग, फिर बह जाते हैं उनके मवेशी, उनकी पूजा की घंटी बह जाती है बह जाती है महवीर जी की आदम कद मूर्ती घरों की कच्ची दिवारे फूल पत्ते पाट पटोरे सब बह जाते हैं मगर पानी में घिरे हुए लोग शिकायत नहीं करते वे हर पीमत पर अपनी चिलम की छेद में कहीं न कहीं बचा रखते हैं थोड़ी सी आग वे जला देते हैं एक तुटही लाल टेंट तांग देते हैं किसी उंचे बास पर जहां उनके होने की खबर पानी के पार तक पहुँचती रहे फिर उसे मद्धम रोष्णी में पानी की आखों में आखे डाले हुए वे राद भर ख़ड़े रहते हैं पानी के सामने, पानी की तरफ, पानी के खिलाफ, सिर्फ उनके अंदर अरार के तरह हर बार कुछ तूटता है, हर बार पानी में कुछ गिरता है. छपाक, छपाक, छपाक. केदार नाथ सेंग जी की कविता मैं हूँ प्रतियूश रॉनक देखते रहे हैं निउस पिंच शुक्रिया