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Summary
असम में हर साल भीशल बार आती है, जिसमें 600 से ज़ादा गाओं पानी में डूब जाते हैं और 68 लोगों की जान जाती है। 6.5 लाख लोग अभी भी बाल से प्रभावित हैं।
From the report
असम को बाल मुक्त बनाएंगे साल 2016 में बीजेपी ने अपने विजन डॉक्यूमेंट में ये वादा किया था 2021 की विदानसमा चुनाओं में केंद्री गिरिह मंत्री अमिश्या ने भी कहा था कि 5 साल में असम को बाल से मुक्त कर दिया जाएगा लेकिन 2026 में तस्वीर फिर वही है 600 से ज़ादा गाओं पानी में डूबे हैं 68 लोग की जाने जा चुकी हैं करीब 6.5 लाख लोग अब भी बाल से प्रभावित हैं हजारों लोग राहा शिवरों में हैं सेना एंडियारफ और SDRF लगतार बचाओं में जुटी हैं। बच्चे स्कूल छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं और कई परिवार अपनों को हमेशा के लिए खो देते हैं ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर असम में हर साल इतनी भीशल बार क्यों आती है क्या इसकी वज़े सिर्फ बारिश है या फिर इसके पीछे भुगोल, ब्रह्मपुत्र, जलवायू परिवर्तन और इंसानी गलतियों की लंबी कहानी छिपी है है नमस्ते मेरा नाम सौरव तृपाठी है आप न्यूस पींच देख रहे हैं आज असम बाड़ पर पूरी बात विस्तार से करेंगे असम की बाड़ सिर्फ आसमान से वरसने वाले पानी की कहानी नहीं है ये ब्रह्मपुत्र की ताकत की कहानी है हिमालय की बनावट की कहानी है जंगलों की कटाई की कहानी है बेतरतीभ विकास की कहानी है और जल वायू परिवर्तन की भी कहानी है यही वज़े है कि हर साल मौनसू नाते ही लाखों लोगों की जंदगी पानी की भरोसे रह जाती है असम में हर साल की तरह इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही बने हैं सैकडों गाओं देखते ही देखते पानी में समा गए सडके तूट गए, पुल बह गए, खेतों में खड़ी फसल खत्म हो गए कई गाओं का संपर्क पूरी तरीके से कट गया लोगों अपनी पूरी जिन्दगी एक नाओं में भर कर सुरक्षित जगे की तलाश करते रजराये। 13 13 साथवी कक्षा का छात्र, अपने माता पिता के इकलोती संतान, जब बाल का पानी गाओं में तेजी से घुसा, तब उसने देखा कि उसका तीन महिने का पालतु पिल्ला, बर उन तेज बहाओं में बहरा है, हरदीप ने एक पल भी नहीं सोचा, वो सिधे पानी में कूद गया के माता पिता फूट फूट कर रो रहे थे और पास में वही पिल्ला चुप चाब बैठा था इसे बचाने के लिए हरदीप ने अपनी जान दौंपर लगा दी यही तस्वीर बताती है कि बार सिर्फ घर नहीं बहाती ये परिवारों की पूरी दुनिया बाहर ले जाती है लेकिन आखिर असमी हर साल इतनी बड़ी तबाही क्यों जाता है इसका जवाब असम के भूगोल में छिपा है बारत का शायदी कोई दूसरा राज होगा जिसके जिंदगी एक नदी इतनी गहराई से तै करती हो उस नदी का नाम है ब्रह्मपुत्र ब्रह्मपुत्र एशिया की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर नदीयों में गिनी जाती है इसकी शुरुवात तिबत में यालुंग सांगपू की रूप में होती है वहाँ से ये हिमाले को चीरते हुए अरुनाचल प्रदेश में स्यांग बनती है फिर दिबांग, लोहित और Дरजनों दूसरी नदीयों का पानी अपने साथ लेकर असम में ये प्रवेश करती है जब तक ही असम पहुंसती है तब तक इसमें एक लेरशीरों का पानी बर्फ का पिगला पानी, पहारों से उतरती नदीयों का पानी और पुरु उत्तर में हुई भारी बारिश का पानी मिल चुका होता है यानि असम तक पहुंसते पहुंसते ये नदी अपने सबसे विशाल रूप में होती है लेकिन सिर्फ नदी बज़े नहीं है असम की भोगोलिक बनावट भी बार को लगबग तै कर देती है पूरा राज्य एक लंबी और सक्री घाटी में बसा है। उत्तर में पूर्वी हिमाले, दक्षिण में मेघाले का पठार, पूर्व में नागा और पठकाईब की पहाडियां। 50 पहुंचता है जब इन सभी नदियों में आई बाड एक साथ असम पहुंचती है तब नदी के पास इतना पानी समालने के जगए नहीं बसती है और फिर शुरू होती है तबाही ब्रह्मपुत्र की एक और खासियत इसे बाकी नदियों से अलग बनाती है ये दुनिया के सबसे ज्यादा बारिश भी बड़ी बाढ़ में बदल जाती है ब्रह्मपुत्र एक जगह टिक कर भी नहीं भेड़ती यह हर साल अपना रास्ता बदलती रहती है कई धाराओं में बढ़ जाती है बीच में रेत के बड़े टापू बनते हैं जिन्हें चर कहा जाता यही वजह है कि तटबंदों पर हर साल नवाव बढ़ता है, कई बार वे तूट जाते हैं और कुछी घंटों में गाउ पानी में डूब जाते हैं. लेकिन पूरी गलती प्रकृति की भी नहीं है जानकार मानते हैं कि इंसानों ने भी इस संकट को पहले से जादा खतरनाक बना दिया है नागलैन और असम के कई इलाकों में वर्षों से जंगल काटे गए खनन हुआ पहाडियों को खोदा गया इट भटे बने वेटलैंड पर कबजे हुए नदियों के प्राक्रितिक रास्तों पर निर्मार हुआ पहले जंगल बारिश का पानी रोग लेते थे आज वही पानी सीधे नदीयों में पहुंसता है पहले विटलेंड आतरिक्त पानी सोख लेते थे आज वहाँ इमार्ते खड़ी हैं पहले नदीयों के पास फैलने की जगए थी आज वहाँ सडके और बस्तियां यानि हमने खुद भी पानी के रास्ते बंद किये हैं जल बायू पर वर्तन ने हालात और बिगार दिये हैं अब बारिश पहले जैसी नहीं होती कई बार कुछ घंटों में पूरे महिने जितनी बारिश हो जाती है वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं पूर्वी हिमाले में आत्यधिक बारिश की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं ग्लैशियर तेजी से पिघल रहे हैं नहीं लगा पाए सवाल यह भी उठता कि क्या असम को कभी बाड मुक्त बनाया जा सकता है एक्सपर्ट्स का जवाब साफ है नहीं कम से कम पूरी तरीके से तो नहीं क्योंकि बाड यहां की प्राकृतिक विवस्था का हिस्सा है ब्रह्मपुत्र हर साल उपजाओ मिट्टी भ रोकना होगा बैतर बार चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी और ऐसे राहात केंद्र बनाने होगे जहां लोग सुरक्षित रह सकें अब बात सरकार के accountability के कर लेते हैं, कि सरकार जो तमाम चुनावी वादे किये बैठी है, तमाम दावे किये बैठी है, क्या वो वाकई जमीन पर उतरता दिख रहा है, तो बहुत सारे जानकार कहते हैं कि इतना होना चाहिए उतना नहीं दिख रहा है, वैसे भी आपको बता दे हुए हैं प्राकृतिक आपदा में मालो अजबाब का नुकसान समझ में आता है लेकिन जो जाने गई उन्हें बचाया जा सकता था यह बार-बार कहना जरूरी है सरकार के पास पूरी मशीनरी है जिसका काम लोगों को बचाना है मौसम भाग है जो संभावित बाड़ की चितावनी जारी करता है स्टेट और नेशनल डिजासर रिलीफ फोर्स है सेना ऐसी प्राकृतिक आपदा में मदद के लिए आती है लेकिन जिस पैमाने पर असम में लोगों को जान अपनी गवानी पड़ रही क्या हेमनता विश्वसर्मा सरकार की इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है क्या सरकार ऐसे प्राप्तिक आपदा बता कर अपनी जिम्मेदारी से पला छोड़ा सकती है, इस सवाल जरूरी है और पूछे जाने चाहिए और हम पूछेंगे भी बाकी नज़र हम मनाए हुए हैं आप अगर असम के बारे में आपको लगता है कुछ और हमें बताना चाहिए तो कॉमेंट बॉक्स में लगकर जरूर बताएगा बाकी देखते रहे हैं नूस पर जिसे लिखा था हमारी साथी खुश्बूने कैमरी के पीछे अनुराख शुक्